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गुरुवार, 14 अप्रैल 2016

रवानी इश्क़ मेरा ...

किसी  की  आह  दर  तक  आ  गई  है
कि  ख़ामोशी  असर  तक  आ  गई  है

बुज़ुर्गों  ने  रखा  था  दूर  जिसको
वो  वहशत  आज  घर  तक  आ  गई  है

पड़ोसी  के  मकां  की  हर  ख़राबी
मेरे  दीवारो-दर  तक  आ  गई  है

इरादा-ए-सफ़र  की  पुख़्तगी  है
कि  मंज़िल  ख़ुद  नज़र  तक  आ  गई  है

मैं  दरिया  हूं  रवानी  इश्क़  मेरा
ये  बेताबी  बहर  तक  आ  गई  है

उठी  जो  शान  से  बर्क़े-बग़ावत 
सियासत  के  शजर  तक  आ  गई  है

उठा  कर  अस्लहे  तैयार  रहिए
यज़ीदी  फ़ौज  सर  तक  आ  गई  है  !

                                                                                     (2016)

                                                                              -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: दर : द्वार ; ख़ामोशी : मौन ; असर : प्रभावोत्पादकता ; बुज़ुर्गों : पूर्वजों ; वहशत : उन्माद, पशु-वृति ; मकां : गृह ; दीवारो-दर : भित्ति एवं द्वार ; इरादा-ए-सफ़र : यात्रा का संकल्प ; पुख़्तगी : दृढ़ता ; मंज़िल : लक्ष्य ; दरिया : नदी ; रवानी : प्रवाह ; बेताबी : व्यग्रता ; बहर : समुद्र ; बर्क़े-बग़ावत : विद्रोह की तड़ित ; शजर : वृक्ष ; अस्लहे : अस्त्र-शस्त्र ; यज़ीदी फ़ौज : अरब के एक अत्याचारी, सिद्धांतविहीन शासक यज़ीद की सेना जिसने हज़रत अली अ. स. के उत्तराधिकारियों का वध किया ।