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सोमवार, 30 जून 2014

फ़रेब है हुज़ूर...

जिन्हें  न  होश  रहा  ज़िंदगी  की  राहों  का
सुना  रहे  हैं  हमें  फ़लसफ़ा  गुनाहों  का

मिला  न  पीर  हमें  कोई  इस  ज़माने  में
तलाशते  हैं  पता  रोज़  ख़ानक़ाहों  का

'लगो  न  शाह  के  मुंह', 'दूर  रहो  हाकिम  से'
ज़रा  बताएं  कि  हम  क्या  करें  सलाहों  का  ?

ख़्याल  नेक  नहीं  है  तिरी  अदालत  का
मिज़ाज   ठीक  नहीं  है  मिरे  गवाहों  का

कहीं  बहार  न  बादे-सबा,  न  'अच्छे  दिन'
फ़रेब  है  हुज़ूर  आपकी  निगाहों  का

बुज़ुर्गे-क़ौमो-दीन,  वाल्दैन  ही  काफ़ी
हुआ  न  हमसे  एहतराम  कभी  शाहों  का

तिरे  गुनाह  ख़ुदा  गिन  रहा  है  बरसों  से
हिसाब  मांग  रहा  है  तमाम  आहों  का  !

                                                                    (2014)

                                                           -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: फ़लसफ़ा: दर्शन; पीर: सिद्ध व्यक्ति; ख़ानक़ाहों: मठों, सिद्ध व्यक्तियों का स्थान; हाकिम: प्रशासक, अधिकारी; नेक: शुभ, अच्छा; मिज़ाज: मनःस्थिति;  बादे-सबा: सबेरे की पुरवाई; फ़रेब: छल, कपट; बुज़ुर्गे-क़ौमो-दीन: राष्ट्र  और धर्म के पूर्वज, मान्य व्यक्ति; 
वाल्दैन: माता-पिता; एहतराम: सम्मान।  

शनिवार, 28 जून 2014

सूलियां तैयार हैं ...

है  अजब  दीवानगी  सय्याद  की
चाहता  है  जां  दिले-नाशाद  की

चांद  के  दिल  पर  गिरी  है  बर्क़-सी
चांदनी  ने  क्यूं  हमारी  याद  की

है  निगाहे-यार  में  सारी  शिफ़ा
बेवजह  अत्तार  से  फ़र्याद  की

आशिक़ी  में  लुट  गए  दोनों  जहां
नस्ले-आदम  शौक़  ने  बर्बाद  की

रोटियां  मत  मांगना,  फ़ाक़ाकशॉ
सूलियां  तैयार  हैं  जल्लाद  की

क्या  सिकंदर  और  क्या  चंगेज़,  सब
बात  करते  हैं  मिरे  फ़ौलाद  की

जिस  ख़ुदा  के  हाथ  में  थी  ज़िंदगी
याद  उसने  मग़फ़िरत  के  बाद  की  !

                                                             (2014)

                                                      -सुरेश  स्वप्निल

शब्दार्थ: दीवानगी: उन्माद, अतिशय प्रेम; सय्याद: बहेलिया; दिले-नाशाद: दु:खी हृदय; बर्क़: आकाशीय तड़ित, बिजली; 
निगाहे-यार: प्रेमी की दृष्टि; अत्तार: दवा बेचने वाला; फ़र्याद: प्रार्थना; नस्ले-आदम: मनुष्य की पीढ़ी; फ़ाक़ाकश: भूखे पेट सोने वाले; 
फ़ौलाद: तलवार का लोहा; मग़फ़िरत: मोक्ष ।

शुक्रवार, 27 जून 2014

ख़ुदा को कौन समझाए ?

अर्श  पर  तूफ़ां  उठा  आए  युं  ही
हम  ख़ुदा  का  दिल  चुरा  लाए  युं  ही

चांद  से  कुछ  दिल्लगी  की  बात  की
और  दीवाना  बना  आए  युं  ही

चश्म  नादां  जिस  तरह  बा-सब्र  है
चैन  बेबस  रूह  भी  पाए  युं  ही

खोल  कर  रख  दी  हक़ीक़त  सामने
शाह  की  नज़रें  झुका  आए  युं  ही

दांव  पर  है  ज़िंदगी  दहक़ान  की
इक  उमीदों  की  घटा  छाए  युं  ही

क़ैद  है  दिल  की  रग़ों  में  जो  लहू
अश्क  बन  कर  आज  बह जाए  युं  ही

उम्र  भर  ईमान  पर  क़ायम  रहे
पर  ख़ुदा  को  कौन  समझाए  युं  ही  !

                                                                   (2014)

                                                          -सुरेश स्वप्निल

शब्दार्थ: अर्श: आकाश, स्वर्ग; दिल्लगी: मनोविनोद; चश्म: आंख; नादां: अबोध; बा-सब्र: धैर्यवान; बेबस: विवश; 
रूह: आत्मा; हक़ीक़त: यथार्थ; दहक़ान: कृषक-जन; रग़ों: शिराओं, धमनियों; ईमान: आस्था। 
  


बुधवार, 25 जून 2014

हां, बग़ावत भी करेंगे...

लोग  हमसे  पूछते  हैं  साथ  क्या  ले  जाएंगे
हाथ  ख़ाली  आए  थे,  भर  कर  दुआ  ले  जाएंगे

चाक  दामन,  सर  निगूं,  नीची  नज़र;  दरबार  में
मुफ़लिसो-मज़लूम  आख़िर  और  क्या  ले  जाएंगे

शाह  के  आलिम  ग़ज़ल  का  कर  रहे  हैं  तब्सिरा
हम  अगर मुजरिम  रहे,  हंस  कर  सज़ा  ले  जाएंगे

हां, बग़ावत  भी  करेंगे  ज़िंदगी  के  वास्ते
इस  मुहिम  में  सर  हथेली  पर  कटा  ले  जाएंगे

है  बला  का  ज़ोर  हम  फ़ाक़ाकशों  की  आह  में
लब  हिले  तो  तख़्ते-शाही  को  उड़ा  ले  जाएंगे

आएगा  मेहनतकशों  का  राज  जिस  दिन  मुल्क  में
अर्श  तक  हिन्दोस्तां  का  मर्तबा  ले  जाएंगे

है  बहुत-कुछ  ख़ुल्द  में,  मुमकिन  हुआ  तो  देखिए
वापसी  में  साथ  अपने  इक  ख़ुदा  ले  जाएंगे  !

                                                                                  (2014)

                                                                          -सुरेश स्वप्निल

शब्दार्थ: चाक: फटा हुआ; दामन: उपरिवस्त्र; निगूं: झुका हुआ; मुफ़लिसो-मज़लूम: निर्धन एवं अत्याचार-पीड़ित; आलिम: विद्वत्जन; तब्सिरा: समीक्षा; मुजरिम: अपराधी; बग़ावत: विद्रोह; मुहिम: अभियान; फ़ाक़ाकश: भूखे पेट रहने वाले; लब: ओष्ठ; तख़्ते-शाही: राजासन; मेहनतकश: श्रमिक-जन; अर्श: आकाश; मर्तबा: प्रतिष्ठा; ख़ुल्द: स्वर्ग; मुमकिन: संभव। 

सोमवार, 23 जून 2014

अच्छे दिनों की बात...

लोग  मौसम  की  दुहाई  दे  रहे  हैं
आप  इस  पर  क्या  सफ़ाई  दे  रहे  हैं ?

चार  दिन  बैठे  नहीं  हैं  तख़्त  पर  वो
ऐब  खुल- खुल  कर  दिखाई  दे  रहे  हैं

थी  बहुत  उम्मीद  जिनको  शाह  जी  से
आज  उनके  ग़म  सुनाई  दे  रहे  हैं

दे  रहे  हैं  दिल  कहीं  तो  जान  लीजे
ज़िंदगी  भर  की  कमाई  दे  रहे  हैं

क्या  इन्हीं  अच्छे  दिनों  की  बात  की  थी
ख़ूब  दिल  से  बेवफ़ाई  दे  रहे  हैं

क्यूं  क़सीदे  हम  पढ़ें  इन  हाकिमों  के
कौन  सी  हमको  ख़ुदाई  दे  रहे  हैं  !

ताजिरों  के  हाथ  दे  दी  ज़िंदगी  भी
आप  कैसी  रहनुमाई  दे  रहे  हैं  ?

                                                               (2014)

                                                        -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: ऐब: दोष; बेवफ़ाई: कृतघ्नता; क़सीदे: प्रशंसा-गीत; हाकिमों: शासकों; ख़ुदाई: संसार पर अधिकार; 
ताजिरों: व्यापारियों; रहनुमाई: नेतृत्व, मार्गदर्शन।  

शुक्रवार, 20 जून 2014

बहाने बदल गए ...!

किसका  गुनाह  है  कि  ज़माने  बदल  गए
तहज़ीबे-रस्मो-राह   के   मा'ने  बदल  गए

तर्ज़े-बयां  में  अब  वो:  कहां  बात  रह  गई
वो:  मुर्कियां,  वो:  राग  पुराने  बदल  गए

ये:  कनख़ियों  के  वार,  ये:  हंसना,  ये:  रूठना 
कब  से  तिरी  नज़र  के  निशाने  बदल  गए

ग़ालिब  तिरे  शह्र   में  रहें  किस  ख़याल  से
तेरे  शहर  के  चाहने  वाले  बदल  गए

मजलिस  वही,  मिज़ाज  वही,  मर्ज़  भी  वही
अच्छे  दिनों  के  ख़्वाब  सुहाने  बदल  गए

सच  है  कि   इंतेख़ाब  का  हक़  है  जनाब  को
मौक़ा  मिला  नहीं  कि  दिवाने  बदल  गए

अब  भी  वही  है  भूख  के  मारों  की  दास्तां
बदला  निज़ाम  या  कि  बहाने  बदल  गए ?!

                                                                      (2014)

                                                            -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: गुनाह: अपराध; तहज़ीबे-रस्मो-राह: परस्पर शिष्टाचार की सभ्यता; मा'ने: मा'यने, अर्थ; तर्ज़े-बयां: अभिव्यक्ति की शैली, गीत आदि की धुन;   मुर्कियां: स्वरों का घुमाव-फिराव; मजलिस: सभा (लोकसभा, आदि); मिज़ाज: स्वभाव, पद्धति; मर्ज़: रोग, समस्या; इंतेख़ाब: चुनाव; दास्तां: आख्यान; निज़ाम: शासन।  


बुधवार, 18 जून 2014

अच्छे दिनों से क़ब्ल...

मजमूं  तड़प  रहे  हैं  रिहाई  के  वास्ते
लब  खोलिए  जनाब  ख़ुदाई  के  वास्ते

गर्दो-ग़ुबार  रूह  तलक  आ  न  पाएंगे
कहते  हैं  शे'र  दिल  की  सफ़ाई  के  वास्ते

तहज़ीब  तिरे  शह्र  से  कुछ  दूर  रुक  गई
मिलते  हैं  लोग  रस्म-अदाई  के  वास्ते

अच्छे  दिनों  से  क़ब्ल  हमें  अक़्ल  आ  गई
कासा  मंगा  लिया  है  गदाई  के  वास्ते

फ़रमाने-शाह  है  कि  सर-ब-सज्द: सब  रहें
वो:  क़त्ल  कर  रहे  हैं  भलाई  के  वास्ते

जश्ने-जम्हूर  रंग  पे  आया  है  इस  तरह
दुम्बे  सजे  हुए  हैं  क़साई  के  वास्ते

सुनते  हैं  तिरी  बज़्म  में  हाज़िर  हैं  शाहे-अर्श 
हम  भी  खड़े  हुए  हैं  रसाई  के  वास्ते

फ़ातेह  क्या  हुए  कि  निगाहें  बदल  गईं
लाए  हैं  नमक  ज़ख़्म-कुशाई  के  वास्ते

रिश्वत से  मुअज़्ज़िन  की  जिन्हें  नौकरी  मिली
देते  हैं  अज़ां  नेक  कमाई  के  वास्ते ! 

                                                                 (2014)

                                                       -सुरेश  स्वप्निल

शब्दार्थ: मजमूं: विषय, कथ्य; रिहाई: मुक्ति; लब: ओष्ठ; ख़ुदाई: संसार; गर्दो-ग़ुबार: धूल-मिट्टी; तहज़ीब: सभ्यता;  रस्म-अदाई: प्रथा का निर्वाह, औपचारिकता;  क़ब्ल: पहले; कासा: भिक्षा-पात्र;  गदाई: भिक्षा-वृत्ति; फ़रमाने-शाह: शासकीय आदेश; सर-ब-सज्द::नतमस्तक; जश्ने-जम्हूर: लोकतंत्र का उत्सव; दुम्बे:  भेड़; क़साई: वधिक;  बज़्म: सभा, गोष्ठी;  रसाई: पहुंच; फ़ातेह: विजयी; ज़ख़्म-कुशाई: घाव उभारने;  मुअज़्ज़िन: अज़ान देने वाला।