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शुक्रवार, 19 जनवरी 2018

ये: शौक़े-क़त्ल बुरा...

ये: एहतरामे-वफ़ा  है  कि  कम  नहीं  होता
अजीब  मर्ज़  लगा  है  कि  कम  नहीं  होता

इधर-उधर  के  कई  ग़म  उठा  लिए  सर  पर
मगर  ये:  बार  बड़ा  है  कि  कम  नहीं  होता

बिखर  रहा  है    मेरा  ज़ह्र    गर्म  झोंकों  से
बग़ावतों  का  नशा  है  कि  कम  नहीं  होता

तेरे  रसूख़  के   क़िस्से    कभी  नहीं  थमते
इधर  वो:  रंग  चढ़ा  है  कि  कम  नहीं  होता

कहां  कहां  से  लहू  रिस  गया  रिआया  का
फ़ुसूं-ए-शाह  नया  है  कि  कम  नहीं  होता

अभी  तो  दाग़  हज़ारों  जबीं  पे  उभरेंगे
ये:  शौक़े-क़त्ल  बुरा  है  कि  कम  नहीं  होता

तेरा  ग़ुरूरे-अना  है  कि  सर  से  ऊपर  है
मेरा  ये:   ख़ौफ़े-ख़ुदा  है  कि  कम  नहीं  होता !

                                                                                                  (2018)

                                                                                           -सुरेश  स्वप्निल 


शब्दार्थ: एहतरामे-वफ़ा : आस्था के प्रति सम्मान; अजीब : विचित्र; मर्ज़ : रोग; ग़म : शोक, दुःख; बार : बोझ, भार; ज़ह्र : विष; बग़ावतों : विद्रोहों; नशा : उन्माद; रसूख़ : प्रभाव; फ़ुसूं : जादू, मायाजाल; दाग़ : कलंक; जबीं : मस्तक; शौक़े-क़त्ल : हत्या की अभिरुचि; ग़ुरूरे-अना : अहंकार का गर्व;  ख़ौफ़े-ख़ुदा : ईश्वर का भय।







गुरुवार, 18 जनवरी 2018

दुश्मनों की कमी...

वफ़ा  में  ज़रा  सी  कमी  पड़  गई
हमें  दुश्मनों  की   कमी  पड़  गई

दरिंदे    गली  दर  गली    छा  गए
कि  इंसां की  भारी कमी  पड़ गई

चला  शाह   घर  लूटने   रिंद   का
ख़ज़ाने  में   थोड़ी  कमी  पड़  गई

कभी   ज़ब्त  की   इन्तेहा  हो  गई
कभी जोश की भी  कमी  पड़ गई

फ़रिश्ते   उठा  ले  गए   बज़्म  से
हमें  जब  तुम्हारी  कमी  पड़  गई

ख़ुदा  रोज़   हमको   बुलाता  रहा
मगर  वक़्त की ही  कमी  पड़ गई

अभी तो  जनाज़ा  उठा  तक  नहीं
अभी  से   हमारी   कमी  पड़  गई !

                                                                        (2018)

                                                                   -सुरेश  स्वप्निल

शब्दार्थ: वफ़ा : आस्था; दरिंदे : हिंसक प्राणी; रिंद : पियक्कड़; ख़ज़ाने : कोष; ज़ब्त : धैर्य; इंतेहा : अति; जोश : उत्साह; फ़रिश्ते : देवदूत; बज़्म : सभा; जनाज़ा : अर्थी।



बुधवार, 17 जनवरी 2018

आसां -सी मुश्किल...

यूं  ही  हमको  दिल  मत  देना
आसां  सी  मुश्किल  मत  देना

कश्ती  तूफां  की  आशिक़  है
मिटने  को   साहिल  मत  देना

दुश्मन  वो:   जो    ईमां  ले  ले
कमज़र्फ़  मुक़ाबिल  मत  देना

मंज़िल  के  सदक़े     गर्म  लहू
सरसब्ज़   मराहिल   मत  देना

जम्हूर     बग़ावत     कर  देगा
उमरा   ना -क़ाबिल  मत  देना

सदियां    हम  पर  शर्मिंदा  हों
ऐसा    मुस्तक़बिल   मत  देना

हक़  से   लेंगे   लड़  कर   लेंगे
तोहफ़े  में   हासिल   मत  देना !

                                                              (2019)
                                                 
                                                        -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: आसां : सरल; कश्ती : नाव; तूफ़ां : झंझावात; आशिक़ : आसक्त; साहिल : तट; ईमां : आस्था; कमज़र्फ़ : ओछा; मुक़ाबिल : समक्ष, प्रतिद्वंदी; मंज़िल : लक्ष्य; सदक़े : न्यौछावर; लहू : रक्त; सरसब्ज़ : हरे -भरे , छायादार; मराहिल : विश्राम-स्थल; जम्हूर : लोकतंत्र; बग़ावत : विद्रोह; उमरा : मंत्रिगण; ना-क़ाबिल : अयोग्य; शर्मिंदा : लज्जित; मुस्तक़बिल : भविष्य; हक़ : अधिकार; तोहफ़े : उपहार; 
हासिल : अभिप्राप्ति।
                                                   

मंगलवार, 16 जनवरी 2018

नाजायज़ डर....

दिल  ही  न  दिया  तो  क्या  देंगे
ज़ाहिर  है      आप      दग़ा  देंगे

हम      दीवाने     हो  भी    जाएं
क्या  घर  को   आग  लगा  देंगे ?

सब  नफ़रत  अपनी   ले  आएं
हम  सबको   प्यार  सिखा  देंगे

ख़ामोश    मुहब्बत  है   अपनी
वो  पूछें        तो     बतला  देंगे

नाजायज़  डर  भी    जायज़  है
वैसे  भी      वो       झुटला  देंगे

मुंसिफ़  ख़ुद  दिल  के काले  हैं
मुजरिम  को   ख़ाक  सज़ा  देंगे

आ  जाए  ख़ुदा  दफ़्तर  ले कर 
हम  सारे    क़र्ज़      चुका  देंगे !

                                                              (2018)

                                                         -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ : ज़ाहिर : स्पष्ट; दग़ा : छल; नफ़रत : घृणा; ख़ामोश : मूक; नाजायज़ : अवैध, अनुचित; जायज़ : वैध; मुंसिफ़ : न्यायाधीश; 
मुजरिम : अपराधी; ख़ाक : न कुछ, नाम मात्र; सज़ा : दंड; दफ़्तर : खाता-बही; क़र्ज़ : ऋण।

सोमवार, 15 जनवरी 2018

मग़रिब हुई हमारी...

बीमारे-आरज़ू  से        कितने        सवाल  कीजे
पुर्सिश  को  आए  हैं  तो    कुछ  देखभाल  कीजे

चुपचाप  दिल  उठा  कर  चल  तो  दिए  मियांजी
इस  बेमिसाल  शय  का    कुछ  इस्तेमाल  कीजे

मायूस  रहते-रहते               मग़रिब  हुई  हमारी
ख़ुशियां   ग़रीब  दिल  की  अब  तो  बहाल  कीजे

फ़ाक़ों  में      मर  रही  हैं    दहक़ान  की  उमीदें
अय  शाहे-वक़्त  आख़िर  कुछ  तो  कमाल  कीजे

भर  जाए  सल्तनत  से  दिल  आपका  कभी  जब
मेरी  तरह    सड़क  पर     आ  कर  बवाल  कीजे

आमाल  के  मुताबिक़    जो  मिल  गया   बहुत  है
किस  बात  पर    ख़ुदा  का    जीना  मुहाल  कीजे

फिर  आएंगे    पलट  कर    हम   क़ैदे-आस्मां  से
इस      हिज्रे-चंद  रोज़ा  का     क्या  मलाल  कीजे  !

                                                                                                  (2018)

                                                                                             -सुरेश  स्वप्निल

शब्दार्थ: बीमारे-आरज़ू : इच्छाओं के रोगी; पुरसिश : हाल-चाल पूछना; शय: वस्तु ; इस्तेमाल : प्रयोग; फ़ाकों : उपवासों; दहक़ान : कृषक (बहु.); उमीदें : आशाएं; शाहे-वक़्त : वर्त्तमान शासक; कमाल : चमत्कार; आमाल : कर्मों; मुताबिक़ : अनुसार; मुहाल : दुरूह, कठिन; क़ैदे-आस्मां : ईश्वर/स्वर्ग की कारा; हिज्रे-चंद रोज़ा : चार दिन के वियोग; मलाल : खेद।

रविवार, 14 जनवरी 2018

टूट कर रो...

बेख़ुदी    गो    बहुत  ज़रूरी  है
ज़र्फ़  भी  तो  बहुत  ज़रूरी  है

दोस्तों  को  दुआ  न  दे  लेकिन
दुश्मनों  को  बहुत  ज़रूरी  है

जल  न  जाए  फ़सल  उमीदों  की
ग़म  नए  बो  बहुत  ज़रूरी  है

लोग    इस्लाह  तो   करेंगे  ही
वो  करें जो   बहुत  ज़रूरी  है

क्यूं  रहे    इज़्तिराब   सीने  में
दाग़े-दिल  धो  बहुत  ज़रूरी  है

सर्द ख़ूं     संगदिल    ज़माने  में
तान  कर  सो  बहुत  ज़रूरी  है

मर  गया  है  ज़मीर  मुंसिफ़ का
टूट  कर  रो   बहुत  ज़रूरी  है  !

                                                       (2018)

                                                -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ : बेख़ुदी : आत्म-विस्मरण; गो : यद्यपि; ज़र्फ़ : गंभीरता, गहनता; दुआ : शुभकामना; उमीदों : आशाओं; ग़म : दु:ख; इस्लाह : मार्गदर्शन, सुझाव देना; इज़्तिराब : विकलता; दाग़े-दिल : मन के कलंक, लांछन; सर्द : ऊष्मा-विहीन; ख़ूं :रक्त; संगदिल: पाषाण-ह्रदय; ज़मीर :अंतरात्मा, विवेक;मुंसिफ़ : न्यायाधीश। 
                                           




शुक्रवार, 8 दिसंबर 2017

हाकिमों के हाथ ...

दुश्मनों  की  नब्ज़  में  धंसते  हुए
ख़ाक  में  मिल  जाएंगे  हंसते  हुए

ज़र्द  पड़ती   जा  रही  है   ज़िंदगी
तार  दिल  के  साज़  के  कसते  हुए

साफ़  कहिए  क्या  परेशानी  हुई
शह्रे-दिल  में  आपको  बसते  हुए

इश्क़  जिसने  कर  लिया  सय्याद  से
कुछ  न  सोचा  जाल  में  फंसते  हुए

आस्तीं  में  पल  रहे  हैं  मुल्क  की
नाग  काले   रात-दिन   डसते  हुए

थे  हमारे  आशियां  कल  तक  जहां
ताजिरों  के     नाम  के    रस्ते  हुए

मुफ़लिसो-मज़्लूम  के  ख़ूं  से  सने
हाकिमों  के    हाथ   गुलदस्ते  हुए  !

                                                                        (2017)

                                                                   - सुरेश  स्वप्निल

शब्दार्थ: